April 11, 2021

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Uttarakhand cm will change sources

उत्तराखंड: कमिश्नरी के भूत ने राज्य की राजनीति में ला दिया भूचाल ! बदलेंगे मुख्यमंत्री ?

उत्तराखंड. राज्य में चौथी विधान सभा का कार्यकाल होने में अभी एक साल बचा है. लेकिन राज्य में मुखिया बदलने की चर्चा ज़ोरों पर है. आपको जानकर हैरानी होगी कि महज़ 4 विधानसभा के कार्यकालों में छोटे से राज्य में 8 अलग-अलग मुख्यमंत्री बने. जिन्होंने 11 बार सीएम पद की शपथ ली. राज्य में ही एक ही कद्दावर नेता हुए जो पूरे 5 साल तक राजसत्ता पर काबिज़ रहे. और दूसरे सबसे अधिक वक्त तक रासत्ता पर काबिज़ रहने वालों में वर्तमान सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत. जिन्हें पूरे 4 साल हो चुके हैं.

दरअसल राज्य में 2017 में विधानसभा चुनाव हुए थे. जिसमें भाजपा सबसे ज्यादा सीटें जीतकर बहुमत हासिल करने वाली पार्टी बनीं. 70 सीटों में से बीजेपी के हाथ 56 सीटें लगीं. और सीएम बनाए गये त्रिवेंद्र सिंह रावत. जिनके 4 साल के कार्यकाल में उनके अपने ही विधायकों ने उनके यानि अपनी ही सरकार के काम काज पर उंगली उठाना शुरू कर दिया. बात 1 या 2 विधायकों की होती तो गनीमत थी, लेकिन ये फेहरिस्त लगातार लंबी होती रही.

नाराज़ विधायकों की लंबी लिस्ट द्वारा सीएम के खिलाफ शिकायतें लगातार शीर्ष नेतृत्व के पास पहुंच रहीं थीं. लेकिन हर बार, भाग्य के तेज़ त्रिवेंद्र मैनेजिंग के खेल में सबको फेल करते जा रहे थे. लेकिन चौथा साल पूरा करते ही वो अपने ही बनाए जाल में फंस गये. बजट सत्र के दौरान ही मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र ने एक ऐसी घोषणा कर दी जो किसी के गले नहीं उतर रही. घोषणा गैरसैंण को कमिश्नरी बनाने के ऐलान की.

हर बार किस्मत के धनी त्रिवेंद्र नाराज़ विधायकों से खुद को बचाते आ रहे थे.लेकिन गैरसैंण में कमिश्नरी का एलान करते ही नाराज़गी का जिन्न चराग से एक बार फिर बाहर आ निकला. चराग को इतना रगड़ा गया था, कि अब जो चराग से धुंआ निकला और धुंएं से जो जिन्न बाहर निकला उसे किस्मत के धनी को मैनेज करने का वक्त ही नहीं मिल सका.

पहले साल 2020 में गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी और फिर 2021 में कमिश्नरी घोषित करने के फैसले ने किस्मत के खेल में धनी रावत की राजसत्ता में रोड़ा पैदा कर दिया. जिस गैरसैंण को राज्य का एक तबका राजधानी बनाने के सपने संजोए बैठा था उसके सपने चकनाचूर हो चुके थे. लेकिन तहसील गैरसैँण को कमिश्नरी बनाने के एलान ने रावत की मुश्किलें और बढ़ा दीं. जिसे लोग शहर बनाने का सपना देख रहे थे उसे कमिश्नरी बनाने का एलान और उस ऐलान में भी कोड़ में खाज़ वाली स्थिति ने त्रिवेंद्र के खिलाफ नाराज़गी का पिटारा खोल दिया.

दरअसल जिस गैरसैंण को कमिश्नरी बनाने का ऐलान किया उसमें कई लोचे हैं. जिसे न तो पार्टी के नेता ही पसंद कर रहे हैं और न ही जनता. गैरसैंण के नये मंडल में गढ़वाल से रूद्रप्रयाग और चमोली ज़िले को लिया गया तो कुमांऊ से अल्मोड़ा बागेश्वर को लिया गया, क्योंकि यही दोनों ज़िले गैरसैँण से सटे हुए हैं. बस इसी फैसले ने त्रिवेंद्र की कुर्सी में कील ठोंकने का काम किया.

कुमांऊ के नेता त्रिवेंद्र के इस फैसले से बेहद खफा हैं. खफा हैं कि उन्हें अब गढ़वाल में आकर गैरसैँण कमिश्नरी के चक्कर काटने होंगे और अपना काम गढ़वाल आकर करवाना होगा. ऐसा नहीं कि त्रिवेंद्र के इस फैसले से पार्टी के नेता तो नाराज हुए ही, इस फैसले से कांग्रेस के नेताओं में भी खासी नाराज़गी और विरोध देखने को मिल रहा है. लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में त्रिवेंद्र के खिलाफ इस फैसले को लेकर गुस्सा सीधे केंद्र तक जा पहुंचा.

जिसका रिएक्शन देखने को मिला ग्रीष्मकालीन राजधानी भराणीसैंण में . जहां बजट सत्र चल रहा था लेकिन अचानक ही 6 मार्च को बीजेपी कोर कमेटी की बैठक देहरादून में शुरू कर दी गई. इस बैठक में ऑब्जर्बर के तौर पर केंद्र से पर्यवेक्षक रमन सिंह और दुष्यंत गौतम. बात इतने पर ही खत्म होती तो गनीमत थी. दिल्ली से तमाम नेताों को भी फौरन देहरादून पहुंचने का फरमान जारी कर दिया. बजट सत्र को बीच में ही छोड़ सीएम त्रिवेंद्र को फौरन देहरादून बुला लिया गया. और साथ ही कई विधायकों को भी. परिणामस्वरूप बजट सत्र को बीच में ही स्थगित करना पड़ा.

केंद्र से डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक समेत सांसद अजय भट्ट, राज्य सभा सांसद नरेश बंसल, समेत कई नेताओं को देहरादून बैठक में शामिल होने का आदेश दिया गया. जिसमें फ्लाइट में देरी के चलते डॉ. निशक वक्त पर बैठक में नहीं पहुंच सके. बैठक खत्म होने पर सबकुछ ठीक होने की बात कही गई. और हवाला दिया गया कि ये बैठक सरकार के 4 साल के कार्यों की समीक्षा के लिए थी.

बहराल इस बैठक में डॉ निशक फ्लाईट मे देरी की वजह से शामिल नहीं हो सके और बैठक से वापस लोट रहे पर्यवेक्षकों रमन सिंह और दुष्यंत गौतम से हवाईअड्डे पर ही मुलाकर कर बात की. 6 मार्च को देहरादून आए दोनों पर्यवेक्षकों ने दिल्ली पहुंचकर आला कमान को पूरी स्थिति से अवगत कराया. और फिर एक दिन बाद ही त्रवेंद्र को दिल्ली तलब कर लिया गया.

अकेले रावत ही नहीं बल्कि कई नाराज़ करीब डेढ़ दर्ज से ज्यादा विधायक तो 6 मार्च को ही पर्यवेक्षकों के पीछे पीछे दिल्ली पहुंच गये थे. जहां सोमवार को बैठकों का दौर चला. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के आवास पर हुई बैठक में गृहमंत्री अमित शाह के अलावा सीएम त्रिवेंद्र के अलावा तमाम विधायक और वरिष्ठ नेता मौजूद रहे. बैठक के बाद भी पार्टी के तमाम नेता ये बोलते नज़र आये कि सीएम चेचिंग जैसी कोई बात नहीं.

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लेकिन आग जो सुलग चुकी है वो लगातार गरम हो रही है. क्योंकि त्रिवेंद्र के खिलाफ शिकायत करने वाले पार्टी के विधायक ही नहीं बल्कि त्रवेंद्र के फैसले से संघ परिवार भी खासा नार्ज़ होने की खबर है. कुंभ की तैयारियों का वक्त पर पूरा न होना, डॉ रमेश पोखरियाल का बार बार कुंभ के कामों पर उंगलीा उठाना. देवस्थानम बोर्ड की स्थापना कर देना. हरि नगरी में सुरा की फैक्ट्री का लगवाना ये तमाम वो अहम वजहें हैं जिसके चलते त्रिवेंद्र की कुर्सी डांमा-डोल है.

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