January 16, 2021

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‘सोशल डिस्टेंसिंग’ आज की नहीं 155 साल पहले की है ये रिवायत

‘सोशल डिस्टेंसिंग’ 155 साल पुरानी है ये रिवायत !

उत्तराखंड- 2021 में कोरोना महामारी के बीच कुंभ का आयोजन कराया जा रहा है. कोरोना के बावजूद इस कुंभ के भव्य और दिव्य कराने पर काफी जोर दिया जा रहा है. लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब कुंभ किसी महामारी के साये में आयोजित कराया जा रहा हो. इससे पहले भी पांच बार ऐसे मौके आए हैं, जब कुंभ के दौरान पूरे देश पर प्लेग महामारी का साया था. साल 1844, 1855, 1879 और 1891 का कुंभ मेला महामारी के बीच संपन्न कराया गया था.

2021 में कोरोना के बीच होगा कुंभ का आयोजन
2021 में कोरोना के बीच होगा कुंभ का आयोजन

1844 में हुए कुंभ में ब्रिटिश सरकार ने बाहरी लोगों के आने पर रोक लगा दी थी. इसके अलावा सख्ती बढ़ाकर दूसरे कुंभ मेंलों को संपन्न करवाया गया था. 1866 के कुंभ में पहली बार लोगों से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करवाया था. जिसका जिक्र गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में रखी पुस्तकों में किया गया है. पुस्तक में लिखी जानकारी के मुताबिक, 1866 में संतों और अखाड़ों ने भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया था. प्लेग महामारी के चलते ब्रिटिश सरकार ने खुले में शौच करने पर रोक लगा दी थी. जगह-जगह पर कूड़ेदानों की व्यवस्था की गई थी. लोगों को नदी के किनारों और घाटों पर गंदगी फैलाने से रोका जा रहा था.

प्लेग के चलते ब्रिटिशों ने  खुले में शौच पर लगाई थी रोक, जगह-जगह की गई थी कूड़ेदान की व्यवस्था
प्लेग के चलते ब्रिटिशों ने खुले में शौच पर लगाई थी रोक, जगह-जगह की गई थी कूड़ेदान की व्यवस्था

प्लेग महामारी के कारण कुंभ और अर्ध्दकुंभ मेंलों में भी संक्रमण फैल गया था. जिससे हजारों की तादाद में लोगों की मौत हुई थी. साल 1844 में हरिद्वार कुंभ में भी संक्रमण फैला था. जिसके बाद तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने सख्ती बरतीऔर हरिद्वार आने वाले यात्रियों पर रोक लगानी शुरु कर दी. इस बात का लोगों ने विरोध करना शुरु कर दिया. जिसके बाद ब्रिटिश सरकार को महामारी के साये में कुंभ को संपन्न कराना पड़ा.

कोरोना से पहले भारत में हैजा, प्लेग को साये में भी सम्पन्न हुआ है, कुंभ
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जब महामारी फैली तो ब्रिटिश सरकार ने साफ-सफाई पर ध्यान देना शुरु किया और 1866 में कुंभ की  जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग को दी. ब्रिटिश सरकार के पुलिसकर्मियों ने एक स्थान पर भीड़ बढ़ने से रोकने के लिए तीर्थ यात्रियों को लाइन लगवाकर घाटों पर जाने की व्यवस्था करवाई. वरिष्ठ पत्रकार और साहित्य कमलकांत बुध्दकर की लिखी पुस्तक गंगाद्वारे महातीर्थे में 1892 में हरिद्वार में फैले हैजा का जिक्र किया गया है.

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