January 21, 2021

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तैरसी तंबड़ों से कुंभ में पहुंचता था दूध

तैरती तंबेड़ों से कुंभ में दूध !

उत्तराखंड-हरिद्वार- भारत में कुंभ का आयोजन आज से नहीं बल्कि सालों पहले से होता आ रहा है। जिसके चलते उस समय और अब आयोजित होने वाले कुंभ में बहुत अंतर है। आधुनिकता के इस दौर में जहां एक जगह से दूसरी जगह समान पहुंचाना चुटकी का खेल समझा जाता है, वहीं पुराने वक्त में कुंभ मेलों के श्रद्धालुओं को प्रतिदिन दूध पहुंचाना टेढ़ी खीर माना जाता था। 1986 के कुंभ तक अमूल, आंचल, और पराग जैसी दूध सप्लाई की कम्पनियां नहीं थी। तब पहुंचता था, तैरती तंबेड़ों से कुंभ में दूध !

1986 के कुंभ तक अमूल, आंचल, और पराग जैसी दूध सप्लाई की कम्पनियां नहीं थी।

जिसके चलते तब हजारों लीटर दूध की सप्लाई गंगा पर तैरती तंबेड़ों के माध्यम से होती थी। कुंभ मेले से लेकर साल भर चलने वाले लक्खी पर्व में दूध लाने के लिए तंबेड़ का ही उपयोग किया जाता था। आपको बता दें, कि तंबेड़ टिन के कनस्तरों को रस्सियों से बांधकर बनाई गई नाव होती है।
तंबेड़ की इन नावों में आधे खाली कनस्तर और आधे दूध से भरे कनस्तर रखे जाते थे। इन नावों पर बैठकर वन गुर्जर चप्पुओं के सहारे तंबेड़ को खेते हुए हरिद्वार-कनखल के घाटों पर पहुंचाते थे। जिसके बाद दूध को दुकानों और दूध पहुंचाने वालों को भेजा जाता था।

पुराने जमाने में चाय का प्रचलन नहीं था और लोग सुबह-शाम दूध ही पीना पसंद करते थे

जिसके बाद ये दूध अन्य दुकानों, धर्मशालाओं और घरों में पहुंचाया जाता था। हरिद्वार और इसके आस-पास के गांवों में साइकिल और बैलगाड़ियों से भी दूध पहुंचाया जाता था। तंबेड़ चलाने वाले सैकड़ों लीटर दूध को लेकर पूरा-पूरा दिन चक्कर लगाते थे, जिसके बाद दूध की आपूर्ति हो पाती थी। पुराने जमाने में चाय का प्रचलन नहीं था और लोग सुबह-शाम दूध ही पीना पसंद करते थे। जिसके चलते दूध की ज्यादा जरुरत हुआ करती थी।

वन गुर्जर वीरभद्र गंगा पार के जंगलों में अपने जानवरों के साथ रहा करते थे

वन गुर्जर वीरभद्र ऋषिकेश से रायवाला और गंगा पार के जंगलों में अपने जानवरों के साथ रहा करते थे। तंबेड़ों से आने वाला दूध कंभ मेलों में आए लाखों श्रध्दालुओं और साधुओं के काम आता था। गंगा के रास्ते आने वाले तंबेड़ों की रस्सियां खोल कर कनस्तरों के रुप में तांगो से रायवाला ले जाया जाता था। जिसके बाद तुरंत ही इन्हें भरकर वापस कुंभ क्षेत्रों के लिए रवाना कर दिया जाता था

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